Saturday, 4 July 2020

गुलाम_पंछी

की अभी जी भरकर उड़ान भरी भी नहीं थी और मालिक का इशारा पाकर फिर से अपने अरमान अपने पंखों में समेट के हर रोज़ की तरह आज भी पिंजरे की ओर वापस लौटने लगे मानो जैसे गुलाम हो किसी के, ये खुला आसमान इन्हीं के लिए तो है यही तो इसकी खूबसूरती को निखारते है पर फिर भी ये अपनी कोशिश में नाकाम नजर आते है दोष इनका नहीं कहीं ना कहीं हमारी सोच का है और फिर कहे तो कहे किससे इनकी बेबसी पर तरस हमें खुद नहीं आता।

#लिखने_की_एक_छोटी_सी_कोशिश

#वाजिद✍️

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