Saturday, 4 July 2020

गुलाम_पंछी

की अभी जी भरकर उड़ान भरी भी नहीं थी और मालिक का इशारा पाकर फिर से अपने अरमान अपने पंखों में समेट के हर रोज़ की तरह आज भी पिंजरे की ओर वापस लौटने लगे मानो जैसे गुलाम हो किसी के, ये खुला आसमान इन्हीं के लिए तो है यही तो इसकी खूबसूरती को निखारते है पर फिर भी ये अपनी कोशिश में नाकाम नजर आते है दोष इनका नहीं कहीं ना कहीं हमारी सोच का है और फिर कहे तो कहे किससे इनकी बेबसी पर तरस हमें खुद नहीं आता।

#लिखने_की_एक_छोटी_सी_कोशिश

#वाजिद✍️

रात_के 3:45



"ठक ठक" शायद दरवाजे पर कोई था,  सोमवार का दिन था तो पापा भी घर ही थे, कबीर देखो दरवाजे पर कोई है पापा ने आवाज़ लगाई। मैने दरवाजा खोला बाहर  सूट पहने एक आदमी  खड़ा था, मैने पूछा जी बोलिए क्या बात है। उसने पापा का नाम लेकर पूछा क्या ये उन्हीं का घर है मैने कहा हां में अभी बुलाता हूं। पापा कोई आपसे मिलने आया है मैने पापा को बुलाया और खुद अंदर चला गया। मैने अभी अपनी किताब उठाई ही थी कि पापा उस सूट वाले व्यक्ति के साथ अंदर आ गए और मुझे इशारा करते हुए कुर्सियों को साफ करने को कहा और उस व्यक्ति को बैठने के लिए आमंत्रित किया। पापा के चेहरे पर  मुस्कान को देख कर में भी वहीं बैठ गया  कुछ देर तक तो कुछ समझ नहीं आया फिर पता चला कि ये सूट वाला व्यक्ति किसी "होम लोन" कंपनी का अधिकारी है। कुछ समय पहले पापा ने "होम लोन"  लेने के लिए घर में मशवरा लिया था और कहा था कि बहुत जल्द हम खुद के घर में रहने लगेंगे, उस दिन हम सब बहुत खुश थे। शायद वो दिन दूर नहीं जब हम खुद के घर में रहने लगेंगे कितना सुकून मिलेगा ना किसी तरह का कोई किराया देना होगा नाही किसी की सुन्नी पड़ेगी में ये सोच ही रहा था कि पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखते  हुए बोला बेटा मैने जिस घर की  बात की थी अगले  महीने से हम उसी में रहेंगे, ये सुन कर खुशी  का कोई ठिकाना नहीं था। बचपन से आज तक यही तो मेरा सपना था कि हम अपना घर लेंगे आज वो सपना हकीक़त में बदल जाएगा। पापा डक्यूमंट्स पर साइन कर रहें थे कि पैन चलते चलते रुक गया। मैने जैसे ही पास में रखे पैन को उठाने के लिए हाथ बढ़ाया सिरहाने रखा पानी का जग ज़मीन पर गिर गया उसकी आवाज़ से मेरी आंख खुल गई। मैं सपना देख रहा था जो की बहुत ही  खूबसूरत था मेरी निगाह दीवार पर टंगी घड़ी पर गई रात के 3:45 बज रहे थे। काश कि सुबह के 5 बज रहे होते, क्यों की अक्सर मैने बुज़ुर्ग लोगो से सुना था कि सुबह 5 बजे के सपने सच हो जाते है।

#सपना

#सब_का_सपना_घर_हो_अपना

#वाजिद✍️

असद की पोस्ट

मैं फेसबुक स्क्रोल कर रहा था तभी एक नोटिफिकेशन आया मैने नोटिफिकेशन के बैल आइकन पर क्लिक किया "असद एड ए न्यू पोस्ट" असद की पोस्ट,जरूर आज फिर कुछ तीखा लिखा होगा। असद मेरा बहुत अज़ीज़ दोस्त है, हिंदी पत्रकारिता का छात्र और चीजो को बड़ी ही बारीकी से पढ़ने लिखने का शौक रखता है। अभी से ही खुद को पत्रकार समझता है समझे भी क्यों ना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हिस्सा जो ठहरा परन्तु आज कल के माहौल को देखते हुए मुझे उसकी फिकर रहती है कहीं उसके साथ कोई अनहोनी ना हो जाए क्यूंकि वो आए दिन देश में बढ़ते इस्लामोफोबिया, कश्मीर में मुस्लिमो के साथ  हो रही बर्बरता, हिन्दू - मुस्लिम प्रोपोगंडा पर   सरकार की आलोचना करता है उसकी गलत नीतियों पर सवाल करता है जबकि मैन स्ट्रीम मीडिया सरकार के इतने पक्ष में है कि  भारतीय सैनिकों पर हुए चीनी हमले का जिम्मेदार भी भारतीय सैना को ही ठहरा दिया। खैर मैंने पोस्ट पर क्लिक किया "ब्राह्मण आतंकवादी क्यों नहीं ?" पोस्ट का शीर्षक पढ़ते ही मुझे बहुत अजीब लगा मैंने उसे तुरंत कॉल करना चाहा पर उसका फोन स्विच ऑफ था चलो बाद में कॉल करूंगा, फिलहाल पोस्ट पढ़ता हूं कि उसने  ऐसा शीर्षक क्यों लिखा है। मैंने पोस्ट पढ़ना शुरू किया "कल उत्तर प्रदेश के कानपुर में एनकाउंटर करने गए आठ पुलिस कर्मी शहीद हो गए जिसमें  विकास दुबे नाम के बदमाश का नाम सामने आ रहा है, बताया जा रहा है कि विकास दुबे बहुत बड़ा क्रिमिनल है इसके खिलाफ कई सारे कैस भी दर्ज है इस सबके बावजूद भी ट्विटर पर मैंने देखा कि एक महिला का फेसबुक पोस्ट वायरल हो रहा है। महिला का नाम रीता पांडेय है जिसने अपनी फेसबुक वॉल पर "ब्राह्मण शेर विकास दुबे ज़िंदाबाद" लिख कर पोस्ट किया और इसके बाद कॉमेंट्स में कई सारे लोग ज़िंदाबाद, विकास दुबे ज़िंदाबाद, ब्राह्मण शेर जैसे कॉमेंट्स करने लगे। पहला सवाल तो यह है कि रक्षकों को मारने वाला शेर कैसे हो सकता ? वो भी जब खुद एक क्रिमिनल है, दूसरा सवाल यह की स्ट्रीम मीडिया ने इस फेसबुक पोस्ट पर बवाल क्यों खड़ा नहीं किया? जबकि हमने देखा कि एक लोकतांत्रिक देश में मुसलमानों को प्रोटेस्ट करने तक पर इसी मीडिया ने देशद्रोही बता दिया, तीसरा सवाल की देश में आतंक फैलाने वाले को मीडिया बदमाश क्यू बोल रही है अतंकवादी क्यों नहीं ? हालांकि ये पहली बार नहीं हो रहा, इससे पहले भी जब एक सख्स को आतंकवादियों के साथ कार में पकड़ा गया उसे अतंकवादी नहीं बोला गया, यहां तक कि मालेगांव बॉम्ब ब्लास्ट में शामिल सांसद को भी मीडिया अतंकवादी नहीं बोलती और भी बहुत से वाकयात है, आखिरी कुछ सवाल यह है कि क्या उर्दू नाम वाले ही आतंकवादी होते है, या कश्मीरियों के इंसाफ की बात करने वाला अतंकवादी होता है, अपने हक की आवाज़ उठाने वाले ही देशद्रोही होते है ? असल बात तो यह है कि वो हर इंसान अतंकवादी है जो  मुल्क में आतंक फेला रहा है और उसका कोई धर्म नहीं होता क्यूंकि धर्म को मानने वाले आतंक नहीं अमन चाहते है। पोस्ट पढ़ने के बाद ही उसकी कॉल आ गई हा भाई बोल क्यों कॉल कर रहा था कुछ नहीं ऐसे ही मैने यह कहते हुए उसके हाल चाल पूछे और फोन कट कर दिया क्यूंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से उसके हौसले पस्त हो और वैसे भी गलत ही क्या लिखा था सब कुछ सच ही तो था यही तो हो रहा है देश में मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है, दलितों के साथ बदसुलूकी की जा रही है, कश्मीर के भी हाल नाज़ुक है अल्लाह रहम करे। शीर्षक की वजह से कुछ लोगो ने उसकी पोस्ट को अपने फेसबुक ग्रुप कट्टर हिंदू ,  ब्राह्मण शेर , हिंदू एकता जैसे अन्य ग्रुप्स में शेयर करदी जिसके बाद उसकी पोस्ट पर लोग कॉमेंट्स में गाली - गलोच करने लगे उसे मारने कि धमकियां देने लगे , उसे पाकिस्तानी कहने लगे और भी बहुत कुछ इससे पहले भी इस तरह की कॉमेंट्स उसकी पोस्टों में देखने को मिलती रहती थी पर उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। शाम को उसकी कॉल आई आवाज़ में नमी के साथ उसने कहा भाई मुझे तुझसे अभी मिलना है मै उसकी आवाज़ सुन कर परेशान हो गया और " तू रुक मैं ही आ रहा हूं तेरे पास" कह कर उससे मिलने चला गया। उसके घर पहुंचने से पहले ही उसकी कॉल फिर से आ गई भाई कब आएगा अब में और परेशान हो गया और जितना जल्दी हो सका उसके घर पहुंचा मैने बाहर बैठी छोटी बहन से पूछा की असद कहा है उसने बताया वो कल से अपने कमरे में ही है मै तुरंत उसके कमरे में गया। असद इतना कहते ही वो मेरे गले लग गया। मैंने उसकी पीठ सहलाते हुए बोला भाई बात क्या है कुछ तो बता ऐसे मायूस मत हो। भाई मै अब कभी नहीं लिखूंगा असद ने बोला, पर क्यों ? मैने पूछा, तब उसने बताया कि पहले तो सिर्फ लोग मुझे ही गालियां देते थे धमकियां देते थे अब बात घर तक आ गई है। दो दिन से कई नंबरों से कॉल आ रहीं है वो मुझे मारने कि धमकियां देते है और अम्मी और बहन के लिए भी बहुत गलत बोलते है, मेरे तक तो ठीक था पर भाई में अपनी वजह से अपनी फैमिली को किसी तरह की मुसीबत में नहीं डालना चाहता कहते हुए असद ने अपनी बात ख़त्म कि। मुझे भी यही सही लगता है कह कर में वापस चला आया, पर अब भी मुझे उसकी फिकर हो रही थी इसलिए मैने उसे कॉल किया पर उसने रिसीव नहीं की चलो बाद में करूंगा और मैं फेसबुक पर उसकी प्रोफ़ाइल देखने लगा यह क्या उसने अपनी सारी पोस्ट डिलीट करदी अभी मैने यह देख ही रहा था कि रिफ्रेश करते ही "एकाउंट नोट फौंड" दिखाने लगा यह देख कर मै अब और भी ज्यादा परेशान हो गया मैने उसे फिर कॉल किया "देट नंबर यूं हेव डेल इट्स स्विच ऑफ प्लीज कॉल अगैन लेटर" अब क्या करूं घर भी नहीं जा सकता रात ज्यादा हो रही है, चलो सुबह का नाश्ता उसी के साथ करूंगा इंशाअल्लाह कहता हुआ मैं सो गया ।रिंग रिंग रिंग...... किसी की कॉल आ रही थी मैने घड़ी की तरफ देखा रात के 1:30 बज रहे थे, इतनी रात को कौन कॉल करेगा में बिस्तर से उठा देखा तो असद के घर वाले नंबर से कॉल आ रही थी मुझे घबराहट होने लगी, लड़खड़ाती आवाज़ में मैने बोला हेल्लो उधर से आवाज़ आई बेटा मैं असद का पापा बोल रहा हूं मैने सलाम(वासलामुआलैकुम) करते हुए पूछा जी बोलिए सब खेरीयत ? बेटा तुम्हारी असद से कोई बात हुई थी ? उसकी बहन ने बताया तुम घर आए थे कल शाम, "असद के पापा ने पूछा" हा अंकल हुई थी वो बहुत परेशान था मैंने मुक्तसर सी बातें बताने के बाद फिर पूछा पर अंकल हुआ क्या? बहुत देर तक कुछ ना बोलने पर उन्होंने बताया कि असद ने आत्महत्या करने की कोशिश की उसकी हालत बहुत गंभीर है हम फलां अस्पताल में है डॉक्टर ने कहा है बचने के उम्मीद नहीं है और तेज़ तेज रोने लगे, मेरे हाथ से भी फोन छूट गया और जार जार रोने लगा। मैंने सारा किस्सा अपनी अम्मी को बताया और रात को ही अस्पताल पहुंच गया। किसी को भी असद के पास जाने की इजाज़त नहीं थी। मैने बहुत इल्तिज़ा की मुझे एक बार मिलने दो पर उन्होंने मेरी एक ना सुनी। असद के पापा,अम्मी, मैं और उसके पड़ोसी सभी बाहर खड़े इंतजार कर रहे थे कि कब डॉक्टर साहब आ कर कहेंगे की अब आप असद से मिल सकते है। कुछ देर के बाद डॉक्टर साहब रूम  से बाहर आए उनके चेहरे से नाउम्मीदी साफ झलक रही थी जिसने दिल को और भी ज्यादा बेचैन कर दिया था, और असद के पापा के करीब जाकर डॉक्टर साहब ने आहिंस्ता से कहा हमने पूरी कोशिश की पर ज्यादा दैर तक गला घुटने की वजह से हम उसे बचा न सके, इतना सुनते ही असद कि अम्मी फुट फुट कर रोने लगी और उनकी आवाज़ पूरे अस्पताल में गूंजने लगी, मेरे आंसू भी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। इस सबके दौरान ही असद को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया और सुबह फजर में उसकी मिट्टी भी लग गई। असद के पापा ने मेरी बताई हुई सारी बातों के आधार पर पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई आज पांच साल हो गए पुलिस इन्वेस्टिगेशन कर रही है पिछले कुछ सालों में बस इतना ही पता चला की जिन नंबरों से उसे कॉल्स आए थे वे सब चोरी के नंबर थे। 

नोट - साइबर बुलिंग दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है जिसका शिकार असद जैसे लोग होते है। साइबरय बुल्लिंग को अंज़ाम देने वाले लोग अपने खिलाफ बोलने वाले को इतना डराते - धमकाते है की वो इंसान जीने की उम्मीद ही छोड़ देता है।

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