की अभी जी भरकर उड़ान भरी भी नहीं थी और मालिक का इशारा पाकर फिर से अपने अरमान अपने पंखों में समेट के हर रोज़ की तरह आज भी पिंजरे की ओर वापस लौटने लगे मानो जैसे गुलाम हो किसी के, ये खुला आसमान इन्हीं के लिए तो है यही तो इसकी खूबसूरती को निखारते है पर फिर भी ये अपनी कोशिश में नाकाम नजर आते है दोष इनका नहीं कहीं ना कहीं हमारी सोच का है और फिर कहे तो कहे किससे इनकी बेबसी पर तरस हमें खुद नहीं आता।
#लिखने_की_एक_छोटी_सी_कोशिश
#वाजिद✍️